हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पर मंथन: बदलते दौर में सत्य और विश्वसनीयता को बताया सबसे बड़ा आधार।


हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पर मंथन: बदलते दौर में सत्य और विश्वसनीयता को बताया सबसे बड़ा आधार।
बिलासपुर। डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर एक दिवसीय विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया गया। पांच सत्रों में आयोजित संगोष्ठी में हिंदी पत्रकारिता की परंपरा, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक पत्रकारिता, जनजातीय सरोकार, डिजिटल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पत्रकारिता के भविष्य की चुनौतियों पर विशेषज्ञों ने विचार रखे।
उद्घाटन सत्र में पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर ने हिंदी नवजागरण और छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के विकास में माधवराव सप्रे के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता है। सोशल मीडिया के दौर में फर्जी खबरों की चुनौती बढ़ी है, इसलिए तथ्यों की पुष्टि और जिम्मेदार पत्रकारिता जरूरी है।
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा ने कहा कि ‘उदन्त मार्तण्ड’ से डिजिटल युग तक हिंदी पत्रकारिता ने समाज में जागरण और लोकतांत्रिक चेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं और लोक संस्कृति को तकनीक से जोड़ने तथा युवाओं से कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग समाजहित में करने का आह्वान किया।
दूसरे सत्र में साहित्यिक पत्रकारिता पर चर्चा करते हुए रामकुमार तिवारी, नाथमल शर्मा और सतीश जायसवाल ने कहा कि साहित्य और पत्रकारिता का संबंध बेहद गहरा है। साहित्य पत्रकारिता को संवेदना और मानवीय दृष्टि देता है, वहीं पत्रकारिता साहित्यिक विचारों और सामाजिक सरोकारों को व्यापक समाज तक पहुंचाती है।
सांस्कृतिक पत्रकारिता पर आयोजित सत्र में राजकमल नायक और ज्योति रघुवंशी ने कला, संस्कृति और लोक परंपराओं को पत्रकारिता में अधिक स्थान देने की आवश्यकता बताई। जनजातीय एवं लोक परंपराओं पर चर्चा में तीजन बाई के योगदान को याद करते हुए अशोक तिवारी ने कहा कि लोककलाओं और जनजातीय परंपराओं को सम्मानपूर्वक समझना और संरक्षित करना जरूरी है। वरिष्ठ पत्रकारों ने आदिवासी युवाओं की मीडिया में भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया।
डिजिटल पत्रकारिता पर चर्चा में अनिमेष शुक्ला, डॉ. सुनील गुप्ता और यशवंत गोहिल ने कहा कि तकनीक ने पत्रकारिता की गति और पहुंच को बढ़ाया है, लेकिन खबरों की जल्दबाजी में तथ्य जांच की अनदेखी विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि माध्यम बदल सकता है, लेकिन पत्रकारिता के मूल मूल्य नहीं बदलने चाहिए।
समापन सत्र में पत्रकारिता की चुनौतियों और भविष्य की दिशाओं पर चर्चा हुई। मनोज व्यास ने मोबाइल पत्रकारिता, पॉडकास्ट और खोजी पत्रकारिता को नई संभावनाओं वाला क्षेत्र बताया। रुद्र अवस्थी ने युवाओं से सोशल मीडिया पर तथ्यपरक और विश्वसनीय सामग्री प्रस्तुत करने का आह्वान किया।
कुलाधिपति संतोष चौबे ने कहा कि नई तकनीक पुरानी तकनीक को समाप्त नहीं करती, बल्कि नए माध्यमों को जन्म देती है। एआई के बढ़ते प्रभाव के बीच इसके उपयोग की स्पष्ट मर्यादाएं और दिशा-निर्देश आवश्यक होंगे। उन्होंने पत्रकारिता की स्वतंत्रता के साथ लोकमंगल को केंद्र में रखने और पत्रकारिता के बेहतर अभिलेखीकरण पर जोर दिया।
संगोष्ठी का समग्र संदेश रहा कि पत्रकारिता का माध्यम चाहे प्रिंट से डिजिटल और अब एआई तक कितना भी बदल जाए, उसकी वास्तविक शक्ति सत्य, विश्वसनीयता, साहित्यिक संवेदना, सामाजिक सरोकार और मानवीय मूल्यों में ही निहित है।








