एक गांव ऐसा जहां के लोग आज भी 70 के दशक में जीवन यापन कर रहे हैं यहाँ के रहने वाले लोग आज भी झरिया का पानी पीते हैं। वीडियो…

लोग झरिया पानी पीने को मजबूर आज तक नहीं मिला शासन का महत्वपूर्ण योजना का लाभ।
(कांकेर छ ग)संवाददाता-बिप्लब कुण्डू✍️
कांकेर।। एक गांव ऐसा जहां के लोग आज भी 70 के दशक में जीवन यापन कर रहे हैं वहां के रहने वाले लोग आज भी झरिया का पानी पीते हैं यहां तक वहां रहने वाले लोग धान की कुटाई मशीन से नहीं लकड़ी नुमा बनी ढेकी से करते हैं लोगों का घर भी लकड़ी से निर्मित एक झोपड़ी नुमा घर है पानी बरसात या गर्मी कैसे भी मौसम क्यों ना हो वहां के लोग उसी घर में ही अपना जीवन गुजार रहे हैं,, गांव में बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य किसी भी प्रकार की सुविधा नहीं है फिर भी वहां के लोग अपना जीवन यापन बखूबी कर रहे हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं कांकेर जिला मुख्यालय से महज 60 किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ों और जंगलों के बीच में बसा वनांचल गांव सरईपानी की जो नरहरपुर विकासखंड अंतर्गत आता है, सरईपानी में बसने वाले लोग आज भी पुरानी तौर तरीके से अपना जीवन यापन करने के लिए मजबूर है सरईपानी गांव में सड़क बिजली पानी शिक्षा तक की व्यवस्था नहीं है जंगलों में बसे इस गांव के लोग विकास से कोसों दूर है आज भी यहां के लोग 60 से 70 साल पीछे का जीवन यापन कर रहे हैं, यहां बसे लोगों की प्रमुख आय का साधन जंगलों से उत्पन्न होने वाली वनोपज चार, तेंदु, महुआ, इत्यादि है। इस आधुनिक जमाने में जहां लोग पानी को स्वच्छ करने के लिए कई प्रकार के यंत्रों का उपयोग कर पानी को निर्मल कर पीते हैं,,वही इस गांव के लोग आज भी झरिया का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं गांव के लोग रोजाना शाम सुबह एक किमी दूर जंगलों के रास्ते से चलकर झरिया से निकलने वाला गंदा पानी को अपने सिर में ढोकर उपयोग में लाते हैं उसी झरिया के पानी से गांव के लोग भोजन बनाते नहाते धोते आदि में इस्तेमाल करते हैं,, झरिया का गंदा पानी इस्तेमाल करने से गांव के लोग कई प्रकार की बीमारियों से भी ग्रसित हो चुकें हैं जिसके बाद भी लोग मजबूरी में झरिया का पानी उपयोग करते हैं क्योंकि गांव में पेयजल के लिए ना ही किसी प्रकार की हैंडपंप है और ना ही नल जल योजना के तहत किसी प्रकार की पाइप लाइन बिछाई गई है यहां तक गांव में एक भी बोर नहीं है। गांव के किसी भी व्यक्ति को सरकार द्वारा मिलने वाला योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है क्योंकि इस गांव में किसी भी व्यक्ति के पास ना ही आधार कार्ड है ना ही राशन कार्ड और ना ही वोटर आईडी कार्ड है जिसके चलते यहां के लोगों को सरकार द्वारा मिलने वाला योजना का लाभ नहीं मिल पाता है वही यहां के लोगों ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों सासंद व विधायक से कई बार इसकी शिकायत की है परंतु अभी तक इनकी सुनवाई नहीं हुई है।
इस गांव में कुल 18 आदिवासी परिवार के लगभग 50 से 60 लोग निवासरत है सरईपानी ग्राम त्रियारपानी के पहाड़ों में बसा है जहां लोग लगभग 25 वर्षों से निवास कर रहे हैं यह क्षेत्र कांकेर जिला और कोंडागांव जिला का सीमावर्ती क्षेत्र में आता है यहां बसे लोग मूलतः कोडागांव जिला के रहने वाले हैं जो लगभग 25 वर्षों से सरईपानी में बसे हुए हैं।
सरईपानी में बसे लोगों के बच्चे आज तक स्कूल कैसा होता है उसे भी नहीं जानते हैं क्योंकि गांव में एक भी स्कूल या आंगनबाड़ी नहीं है जहां बच्चे जाकर पढ़ सके कुछ बच्चे जो गांव से दूर रहकर छात्रावास में पढ़ाई कर रहे थे वह बच्चे भी पढ़ाई छोड़ कर अपने घरों में आकर रहने लगे हैं क्योंकि इनके माता-पिताओं के पास उनको पढ़ाने के लिए पर्याप्त धन नहीं है।सरईपानी गांव में पहुंचने के लिए किसी भी प्रकार की सड़क की व्यवस्था नहीं है गांव के लोगों ने किसी तरह से पहाड़ी को काट काट कर पैदल आने-जाने के लिए रास्ता तैयार किया है जो एक जंगलों से होता हुआ पहाड़ी रास्ता है जहां से सिर्फ पैदल ही चला जा सकता है वहां किसी प्रकार की वाहन नहीं पहुंच सकती है ।
सरईपानी गांव में उचित सड़क की व्यवस्था नहीं होने के कारण गांव में जब किसी व्यक्ति की तबीयत खराब होती है तो गांव में नाही एंबुलेंस पहुंच सकती है और ना ही किसी प्रकार की वाहन वहां तक पहुंच सकती है जिसके चलते वहां के लोगों की काफी तकलीफों का सामना करना पड़ता है कई बार तो वहां के लोगों ने बीमार व्यक्ति को अपने कंधों में ढोकर अस्पताल तक पहुंचाया है। वहीं इस मामले पर संसाद व क्षेत्र के विधायक का कहना है कि जगंल होने के कारण वहां थोड़ी परेशानी हो रही है। अब देखना यह है कि क्या यहां के लोगों को इसी तरह से ही जीवन यापन करना पड़ता है या फिर सरकार इन लोगों की समस्याओं को दूर करती है।




