संतान को अकाल मृत्यु से सुरक्षित रखने एवं दीर्घ आयु के लिए भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि में माताओं ने हल षष्ठी व्रत पूजन किया।

संतान को अकाल मृत्यु से सुरक्षित रखने एवं दीर्घ आयु के लिए भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि में माताओं ने हल षष्ठी व्रत पूजन किया।
मनमोहन सिंह।
खैरा…….. संतान सुख की कामना के साथ संतान को अकाल मृत्यु से सुरक्षित रखने एवं दीर्घ आयु के लिए भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि में माताओं ने हल षष्ठी व्रत पूजन किया।संतान के सुख और लंबी आयु के लिए रखे जाने वाले इस व्रत को रखते समय तालाब में पैदा होने वाले पसहर चावल और बगैर जोते गए पैदा होने वाली चीजों का उपयोग किया गया।
पूरे अंचल में हल षष्ठी व्रत पूजन हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।खमरछठ में माताओं ने माँ महामाया प्रांगण ने छठ माता की पूजा के साथ भगवान श्री कृष्ण के भ्राता बलराम की पूजा की।कथा वाचन करते हुए आचार्य ने बताया कि हल षष्ठी का व्रत जहां पुत्र की लंबी आयु और उसके सुख सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है तो वहीं यह पावन तिथि भगवान शेषनाग के अवतार माने जाने वाले बलराम जी की जयंती के रूप में भी जाना जाता है, जिन्होंने द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई के रूप में जन्म लिया था।हिंदू धर्म अनुसार मान्यता है कि शुभ मुहूर्त में शुभ कार्य को सफल बनाने माताओं ने पवित्र मिट्टी से तालाब बनाक उसके चारो ओर महुआ,बेल,पलाश और कुश लगाकर पूजन सामग्री चुकिया, लाई व महुआ लेकर विधि विधान के साथ-पूजा अर्चना मंगल कामना की गई।ताकि निःसंतान संतान प्राप्ति हो और संतान दीर्घायु होने के साथ उसे अकाल मृत्यु न हो।इस व्रत में करंज की दातुन,करेला के साथ पत्तल का विशेष महत्व रहा।हल षष्ठी व्रत में विशेष रूप से भैंस के दूध और उससे बनी चीजों का ही इस्तेमास किया गया। पूजा करने के बाद माताओं ने अपने बच्चों की पीठ पर चुना कपड़े से 6 बार थपकी दी।इससे बच्चों को सुख समृद्धि और लंबी आयु का वरदान मिलता है।




